वित्त आयोग क्या है | वित्त आयोग के कार्य और अध्यक्ष
वित्त आयोग (Vitt Ayog) एक संवैधानिक संस्था या निकाय है| केंद्र-राज्य के बीच आपस में वित्तीय संबंधों पर महत्वपूर्ण सुझाव देने के लक्ष्य से भारत के राष्ट्रपति द्वारा Vitt Ayog का गठन किया जाता है।
वित्त आयोग क्या है? ये तो हमने जान लिया| अब मैं आपको बताता हूँ कि वित्त आयोग के अध्यक्ष कौन है तथा वित्त आयोग के कार्य क्या है?
इससे पहले हमने नीति आयोग के बारे में पूरी जानकारी दी है|
वित्त आयोग क्या है | Finance Commission in Hindi
Contents
- 1 वित्त आयोग क्या है | Finance Commission in Hindi
- 2 वित्त आयोग के कार्य
- 3 भारतीय वित्त आयोग
- 4 वित्त आयोग (Finance Commission) – कार्य और अध्यक्ष
- 5 परिचय:
- 6 वित्त आयोग के मुख्य कार्य (Functions of Finance Commission)
- 7 वित्त आयोग का गठन और अवधि
- 8 अब तक के वित्त आयोग और उनके अध्यक्षों की सूची
- 9 वित्त आयोग का महत्व
- 10 निष्कर्ष:
केंद्र से राज्यों को वित्तीय हस्तांतरण के लिए दिशा-निर्देश के लिए वित्त आयोग का गठन किया जाता है| वित्त आयोग एक संवैधानिक और सलाहकारी निकाय है| भारतीय वित्त आयोग सर्वप्रथम 1951 में अस्तित्व में आया था|
संविधान के अनुच्छेद 280(1) के अनुसार भारत के राष्ट्रपति प्रत्येक 5 सालों में या फिर जरुरत पड़ने पर उससे पहले एक वित्त आयोग का गठन करते हैं| जिसमे अध्यक्ष के अतिरिक्त चार और सदस्य होंगे|
15वां वित्त आयोग जिसका गठन 2017 में किया गया था, का कार्यकाल 2020-2025 है|
राज्य वित्त आयोग का गठन हमारे संविधान के अनुच्छेद 243(1) के द्वारा किया जाता है|
वित्त आयोग के कार्य
वित्त आयोग का यह दायित्व होता है कि वह निम्नलिखित के सम्बन्ध में राष्ट्रपति को अपने सुझाव और सेवाएं दें-
- केंद्र तथा राज्यों के बीच करों से प्राप्त राजस्व का वितरण और उसमे राज्यों का हिस्सा आवंटित करना|
- अनुच्छेद 275 के तहत भारत की संचित निधि (consolidated fund) में से राज्यों को अनुदान देने या नहीं देने का निर्णय लेना|
- देश के सुदृढ़ वित्त के हित में राष्ट्रपति द्वारा आयोग को दिया गया कोई विशेष निर्देश|
भारतीय वित्त आयोग
| वित्त आयोग | नियुक्ति वर्ष | अध्यक्ष | अवधि |
| पहला | 1951 | केसी नियोगी | 1952-1957 |
| दूसरा | 1956 | के संथानाम | 1957-1962 |
| तीसरा | 1960 | एके चंद्रा | 1962-1966 |
| चौथा | 1964 | डॉ पीवी राजमन्नार | 1966-1969 |
| पांचवां | 1968 | महावीर त्यागी | 1969-1974 |
| छठा | 1972 | पी ब्रह्मानंद रेड्डी | 1974-1979 |
| सातवां | 1977 | जेपी सेलट | 1979-1984 |
| आठवां | 1982 | वाई पी चौहान | 1984-1989 |
| नौवां | 1987 | एन केपी साल्वे | 1989-1995 |
| 10वां | 1992 | के सी पंत | 1995-2025 |
| 11वां | 1998 | प्रो एएम खुसरो | 2025-2025 |
| 12वां | 2003 | डॉ सी रंगराजन | 2025-2025 |
| 13वां | 2007 | डॉ विजय एल केलकर | 2025-2025 |
| 14वां | 2012 | डॉ वाई वी रेड्डी | 2025-2025 |
| 15वां | 2007 | एन के सिंह | 2025-2025 |
वित्त आयोग (Finance Commission) – कार्य और अध्यक्ष
परिचय:
वित्त आयोग (Finance Commission) भारत सरकार द्वारा स्थापित एक संवैधानिक निकाय है, जिसका कार्य केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के वितरण की सिफारिश करना है। इसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत बनाया गया है।
स्थापना: 1951
पहला वित्त आयोग अध्यक्ष: के.सी. नियोगी
वर्तमान वित्त आयोग (15वां): अध्यक्ष – एन. के. सिंह (20252-2025)
वित्त आयोग के मुख्य कार्य (Functions of Finance Commission)
केंद्र और राज्यों के बीच करों के विभाजन की सिफारिश करना।
राज्यों को अनुदान (Grants-in-aid) देने की सिफारिश करना।
स्थानीय निकायों (ग्राम पंचायत और नगर पालिकाओं) को वित्तीय सहायता पर सुझाव देना।
संविधान के प्रावधानों के अनुसार वित्तीय मामलों में सरकार को परामर्श देना।
केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व संतुलन बनाए रखना।
वित्त आयोग का गठन और अवधि
संविधान के अनुच्छेद 280 के अनुसार, प्रत्येक 5 साल में वित्त आयोग का गठन किया जाता है।
राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है।
इसमें एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य होते हैं।
अब तक के वित्त आयोग और उनके अध्यक्षों की सूची
| वित्त आयोग | वर्ष | अध्यक्ष |
|---|---|---|
| 1st | 1951 | के.सी. नियोगी |
| 10th | 1992 | के.सी. पंत |
| 13th | 2025 | विजय एल. केलकर |
| 14th | 2025 | वाई. वी. रेड्डी |
| 15th | 2025 | एन. के. सिंह |
वित्त आयोग का महत्व
राज्यों को वित्तीय स्वायत्तता (Financial Autonomy) प्रदान करता है।
संघीय ढांचे को मजबूत करता है।
संसाधनों के न्यायसंगत वितरण में मदद करता है।
स्थानीय निकायों को वित्तीय सशक्तिकरण प्रदान करता है।
निष्कर्ष:
वित्त आयोग भारत की वित्तीय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। इसके माध्यम से विकासशील राज्यों को आर्थिक सहायता मिलती है, जिससे संतुलित आर्थिक विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।
